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जंतर मंतर पर NEET पेपर लीक प्रदर्शन: गुस्सा जायज़, पर भाषा पर सवाल क्यों ज़रूरी है

NEET पेपर लीक को लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन जारी। जानिए छात्रों की मांग, विवाद की पृष्ठभूमि और प्रदर्शन की भाषा को लेकर उठ रहे अहम सवाल।

(यह एक राय/संपादकीय लेख है)


नई दिल्ली के जंतर मंतर पर एक बार फिर छात्रों और अभिभावकों की भीड़ जुटी है। मांग एक ही है, NEET परीक्षा में हुई गड़बड़ियों और पेपर लीक के आरोपों की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई। यह मुद्दा नया नहीं है। बीते वर्षों में मेडिकल प्रवेश परीक्षा को लेकर उठे विवादों ने लाखों छात्रों के भरोसे को झकझोरा है, जिन्होंने वर्षों की मेहनत सिर्फ इस उम्मीद में लगाई थी कि परीक्षा प्रक्रिया साफ-सुथरी और निष्पक्ष होगी।


इस गुस्से को समझा जा सकता है। जब किसी परिवार का बच्चा दिन-रात मेहनत करके परीक्षा की तैयारी करता है, और फिर पता चलता है कि कहीं पेपर लीक हुआ या गड़बड़ी हुई, तो वह सिर्फ एक परीक्षा की नाकामी नहीं होती, वह लाखों सपनों पर लगा एक झटका होती है। इसलिए जंतर मंतर पर उठ रही आवाज़ें, चाहे वे कितनी भी तीखी क्यों न हों, अपनी जड़ में एक वाजिब शिकायत से निकलती हैं।


लेकिन इसी प्रदर्शन के दौरान सोशल मीडिया और मौके पर मौजूद कुछ वीडियो में जो भाषा सुनने को मिली, वह चिंता का विषय है। प्रधानमंत्री, पुलिस और सेना के खिलाफ सड़क छाप और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किसी भी लोकतांत्रिक विरोध की गरिमा को कमज़ोर करता है। विरोध का अधिकार संविधान ने हर नागरिक को दिया है, और यह अधिकार अनमोल है। पर अधिकार के साथ एक ज़िम्मेदारी भी जुड़ी होती है, कि असहमति को शब्दों की मर्यादा के भीतर रखा जाए।


यहां सवाल यह नहीं है कि किसी संस्था या पद की आलोचना नहीं होनी चाहिए। पुलिस, सेना और सरकार, सबकी जवाबदेही तय होनी चाहिए, और आलोचना लोकतंत्र की जान है। सवाल यह है कि आलोचना और गाली में फर्क कहां खत्म हो जाता है। जब नारे व्यक्तिगत अपमान, गाली-गलौज और भड़काऊ भाषा में बदल जाते हैं, तो असली मुद्दा, यानी परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही, पीछे छूट जाता है और बहस भाषा की मर्यादा पर आ अटकती है।


इसका एक व्यावहारिक पहलू भी है। जो भाषा और लहज़ा हम आज किसी संस्था या पद के खिलाफ अपनाते हैं, वही मापदंड कल किसी और मुद्दे पर, किसी और पक्ष द्वारा, हमारे खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकता है। सार्वजनिक बहस में मर्यादा बनाए रखना किसी एक पक्ष की नहीं, बल्कि पूरे समाज की ज़िम्मेदारी है। अगली पीढ़ी यह देख रही है कि असहमति कैसे जताई जाती है, विरोध किस भाषा में होता है, और गुस्से को किस तरह अभिव्यक्ति मिलती है। अगर स्कूल-कॉलेज जाने वाले बच्चे यह सीखेंगे कि गुस्सा जताने का तरीका गाली-गलौज है, तो यह आदत सिर्फ राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहेगी, यह उनके रोज़मर्रा के व्यवहार में भी उतर आएगी।


इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि छात्र संगठनों, अभिभावकों और आंदोलन का नेतृत्व करने वालों को अपने प्रदर्शनों में भाषा की मर्यादा पर खुद ध्यान देना होगा। मांग जितनी वाजिब है, उसे उतनी ही मज़बूती और गरिमा के साथ रखा जाना चाहिए। इतिहास गवाह है कि जो आंदोलन अनुशासन और संयम के साथ चले, उन्होंने ज़्यादा असरदार और टिकाऊ बदलाव लाए।


अंत में एक विचार का सवाल छोड़ना ज़रूरी लगता है, जिस पर हर पाठक को खुद सोचना चाहिए, क्या सार्वजनिक विरोध में गाली-गलौज और अपमानजनक भाषा को सामान्य मान लेना हमारे समाज के लिए सही दिशा है? क्या हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी असहमति जताने का यही तरीका सीखे? यह सवाल किसी एक सरकार, दल या संस्था के पक्ष या विपक्ष में नहीं है, यह सिर्फ इस बात का है कि हम बतौर समाज बहस की मर्यादा को कहां तक बचाए रख पाते हैं।


NEET छात्रों की मांग जायज़ है और सरकार तथा जांच एजेंसियों को इसका पारदर्शी जवाब देना चाहिए। साथ ही, विरोध की भाषा को भी उतनी ही गंभीरता से देखे जाने की ज़रूरत है, क्योंकि यही भाषा तय करती है कि हमारा सार्वजनिक विमर्श आने वाले वर्षों में किस दिशा में जाएगा।

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